Archive

  • सारांश

    रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। युद्ध के कारण मानवीय संकट, विस्थापन, बुनियादी ढाँचे का विनाश, मुद्रास्फीति और आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान बढ़े हैं। भारत के लिए यह संघर्ष विशेष रूप से जटिल है क्योंकि उसके रूस के साथ लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं, जबकि वह अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के साथ भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है। भारत ने रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी रक्षा-आयात निर्भरता कम करने और अमेरिका,  फ्रांस, इजराइल, जापान आदि के साथ सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया है। 

       ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने रूसी तेल को अल्पकालिक विकल्प के रूप में अपनाया, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से आयात स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता महसूस की। ब्राजील, कोलंबिया, कनाडा आदि से तेल प्राप्त करने तथा घरेलू गैस खोज को बढ़ाने के प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा हैं। युद्ध ने भारत के यूरोपीय संबंधों को भी नए अवसर दिए हैं। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी, डिजिटल क्षेत्र, हरित ऊर्जा और लचीली आपूर्ति-श्रृंखला में सहयोग बढ़ा है। फ्रांस और जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों के साथ भारत के राजनीतिक एवं रक्षा संबंध भी मजबूत हुए हैं।

            भारत को रूस-चीन की बढ़ती निकटता तथा चीन और पाकिस्तान से जुड़े अपने सुरक्षा हितों के कारण सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा। साथ ही, यूक्रेन के पुनर्निर्माण में भारत एक विश्वसनीय भागीदार की भूमिका निभा सकता है और बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग बढ़ा सकता है। 

    निष्कर्षतः- रूस-यूक्रेन युद्ध ने भारत के सामने चुनौती के साथ-साथ रणनीतिक अवसर भी पैदा किए हैं। भारत की विदेश नीति मुख्यतः राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा-विविधीकरण और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण अपनाती दिखाई देती है।

    मुख्य शब्दः- विदेश नीति, राष्ट्रहित, रक्षा, उर्जा, सुरक्षा, विविधीकरण, संतुलन और समाधान

    Author: Dr. shivesh Prasad Rai,
  • सार(ABSTRACT)
    आधुनिक भारतीय शिक्षादर्शन में स्वामीविवेकानंद और रवींद्रनाथटैगोर का योगदानअत्यंत मौलिक एवंदूरगामी है। औपनिवेशिकब्रिटिश शासन द्वारालागू की गईमैकालेवादी शिक्षा प्रणालीने भारतीय युवाओंको अपनी सांस्कृतिकजड़ों से काटकरकेवल प्रशासनिक आवश्यकताओंकी पूर्ति कासाधन बना दियाथा। इसके विरोधमें स्वामी विवेकानंदऔर रवींद्रनाथ टैगोरने मानव-केंद्रित, सर्वांगीण और स्वावलंबीशिक्षा का सिद्धांतप्रतिपादित किया। जहाँस्वामी विवेकानंद ने 'चरित्र-निर्माण' और 'मनुष्य-मेकिंग' (Man-making Education) को शिक्षा कामूल आधार माना, वहीं रवींद्रनाथ टैगोरने 'प्रकृति', 'स्वतंत्रता' और 'सृजनात्मकता' (Naturalism and Creativity)के समन्वय पर बल दिया ।                           

    प्रस्तुत शोध-पत्रका मुख्य उद्देश्यस्वामी विवेकानंद औररवींद्रनाथ टैगोर कीशैक्षणिक विचारधाराओं कासमीक्षात्मक एवं तुलनात्मकअध्ययन प्रस्तुत करनाहै। इस अध्ययनमें दोनों विचारकोंके दर्शन, शिक्षणपद्धतियों तथा पाठ्यक्रमका विश्लेषण कियागया है। यहशोध गुणात्मक (Qualitative) अनुसंधानदृष्टिकोण और विश्लेषणात्मकपद्धति पर आधारितहै। अध्ययन कानिष्कर्ष यह स्पष्टकरता है किविवेकानंद और टैगोरके विचार चरित्र, पर्यावरण, और वैश्विकचेतना के निर्माणके लिए अत्यंतप्रासंगिक हैं।

    मुख्य शब्द (Keywords): स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, शैक्षणिक विचारधारा, चरित्र-निर्माण, प्रकृतिवाद, वेदांत दर्शन, शांतिनिकेतन ।

    Author: Pankaj Kumar Singh