Vol:1,Issue:1,January-March,2026

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डाॕ सुनीता गुप्ता
Abstract

साहित्य और संस्कृति का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। संस्कृति जिन जीवन मूल्यों का संचयन करता है, साहित्य उन जीवन मूल्यों का पोषण करता है। ‘‘साहित्य या संस्कृति के स्थाई और सर्वमानरू मूल्या क्या हैं जिन्हें  हम मनुष्यता की मूल्यांकन धरोहर के रूप में सहेज सकें या जिनके कारण मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य या उसके द्वारा रची जाने वाली संस्कृति ही सही मायनों में मानव संस्कृति है। वस्तुतः साहित्य और संस्कृति के स्थाई मूल्य वे हैं जिन्हें मनुष्य अपने लम्बे सामाजिक जीवन में प्रकृति तथा परिस्थितियों से संघर्ष करते हुये अर्जित और समृद्ध किया है।’’1 संस्कृति मनुष्य की सामासिक सह अस्तित्व का बोध कराती है। साहित्य और संस्कृति युगानुरूप हमारे अन्तर में विगत युगो  को आत्मसात किये रहती है जिससे उनकी निरन्तरता सदा बनी रहती है। ‘‘यही सही है कि युग और व्यवस्थाओ  बदलने के साथ हमारा साहित्य और संस्कृति अभिरूचियां हमारी मान्यतायें हमारे चिार विश्वास बदलने हैं और उनके अनुरूप साहित्य का भी नया रूप सामने आता है जो उनकी गतिशीलता उनकी जीवन्तता और उनकी शक्ति का परिचायक है, किन्तु ऐसा नहीं है कि उनके भीतर जो स्थायी तत्व हैं वे समाप्त हो जाते हैं।’’2 चेतना और साहित्य का अन्तर्सम्बन्ध रीतिकाल में क्षीण दिखता है तो इसका कारण तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां हैं। 

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